कैश कांड में जस्टिस यशवंत वर्मा पर आरोप साबित : नोटों का हिसाब नहीं, टालमटोल जवाब, सबूतों को सुरक्षित नहीं रखा, 3 आरोप हुए सिद्ध

फोटो  : फाइल फोटो 

नई दिल्ली , 12 अगस्त 2026
रिपोर्ट  : एडिटर 

दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड में उनके खिलाफ लगे तीनों आरोप सही साबित पाए गए है । अब उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी है। यह मामला 2025 में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम से नकदी मिलने से जुड़ा है।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार संसद के शीतकालीन सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है। तीन सदस्यीय जांच समिति में जस्टिस वर्मा पर लगे तीनों आरोप सही पाए गए हैं। 

राष्ट्रपति को भेज चुके हैं इस्तीफा:-
हालांकि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ का 1978 में दिया गया फैसला है कि जज का इस्तीफा देना ही उनका पद से हटना है, स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस वर्मा इस साल अप्रैल में इस्तीफ़ा राष्ट्रपति को भेज चुके हैं। इसके बावजूद उनका नाम इलाहाबाद हाई कोर्ट की सूची में है।

ऐसे में यह बहस हो रही है कि जांच समिति की रिपोर्ट में उन्हें दोषी पाए जाने के बाद क्या उन्हें हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है। यह अपनी तरह का ऐसा पहला मामला है। जब जज के इस्तीफा देने के बावजूद उनके खिलाफ जांच हुई और उनका नाम हाई कोर्ट के जजों की सूची में है।

घर में बेहिसाब कैश मिला:-
जांच समिति ने पाया कि जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोर रूम में ₹500 के नोटों के बंडल और अधजले नोट मिले थे। फायर सर्विस और पुलिस के कर्मचारियों ने जांच के दौरान बताया कि नोट सिर्फ एक जगह नहीं थे, बल्कि स्टोर रूम के बड़े हिस्से में फैले हुए थे।

हालांकि, नोटों को जब्त नहीं किया गया, उनकी गिनती नहीं हुई और न ही नोटों के नमूने सुरक्षित किए गए। इसी वजह से समिति यह निर्धारित नहीं कर सकी कि वहां वास्तव में कितनी नकदी थी।

सबूतों से छेड़छाड़ हुई:-
आग बुझने के बाद स्टोर रूम को तुरंत सील नहीं किया गया। सुरक्षा अधिकारी ने जस्टिस वर्मा के स्टाफ को वहां रात करीब 3 बजे सफाई करते देखा। कमेटी ने माना कि इस तरह महत्वपूर्ण सबूत सुरक्षित नहीं रखे गए और उनसे छेड़छाड़ हुई। 

जस्टिस वर्मा के जवाब भ्रामक:-
शुरुआत में जस्टिस वर्मा ने कहा कि उन्हें कैश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। बाद में बचाव में नकदी नकली होने, साजिश के तहत रखे जाने के बात कही।लेकिन समिति ने जस्टिस वर्मा की सफाई को अधूरी, टालमटोल वाली और प्रभाव में भ्रामक माना।

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