फोटो :फाइल फोटो
नीमकाथाना , 01 दिसम्बर 2024
रिपोर्ट : किशोर सिंह लोचिब
आज विश्व एड्स है । इस अवसर पर हिंदुस्तान डिजिटल न्यूज़ ऐप स्वास्थ्य सीरिज के तहत इस संक्रामक बीमारी के बारे में , इसके उपचार सहित सभी पहलुओ पर खास सीरिज लाए है । इसको लेकर हम राजकीय कपिल जिला अस्पताल, नीमकाथाना में पदस्थापित डॉ के के शर्मा, फिजिशियन के साथ खास चर्चा के के बारे में बात करेंगे ।
डॉ के के शर्मा ने बताया कि एड्स एक बहुत ही तेजी से फैलने वाली बीमारी है। इसका पूरा नाम एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंसी सिंड्रोम है। यह एचआईवी यानी ह्यूमन इम्यूनो डेफिसिएंसी वायरस के कारण होता है। यह श्वेत रक्त कणिकाओं (डब्ल्यू बी सी) को नष्ट कर देता है और इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देता है जिससे व्यक्ति की बीमारियों से लड़ने की क्षमता प्रभावित होती है। इसने अब तक पूरी दुनिया में 29 मिलियन से ज़्यादा लोगों की जान ले ली है।
एड्स के कारण :-
1 संक्रमित व्यक्ति का खून किसी दूसरे व्यक्ति के चढ़ाने से,
2 गर्भवती मां से उसके बच्चेमें
3 असुरक्षित यौन संबंधों से
4 संक्रमित इंजेक्शन की सुई से । इंजेक्शन द्वारा नशा करने वाले लोगों में भी इसका खतरा ज्यादा रहता है।
एड्स के लक्षण :-
डॉ शर्मा ने बताया कि एड्स के लक्षण प्रकट होने में लगभग 0 से 12 साल तक लग जाते हैं। एड्स के लक्षण महिला व पुरुषों में अलग अलग हो सकते हैं। बुखार ,थकान, वजन कम होना, दस्त, सूजन वाले नोड्स, यीस्ट संक्रमण, हर्पीज ज़ोस्टर, महिलाओं के पीरियड्स में बदलाव आदि कुछ सामान्य लक्षण हैं। कमज़ोर प्रतिरक्षा के कारण संक्रामक व्यक्ति कुछ असामान्य संक्रमणों का शिकार हो जाता है जैसे लगातार बुखार, रात में पसीना आना, त्वचा पर चकत्ते, मुंह में घाव और बहुत कुछ।
एड्स का उपचार और रोकथाम :-
उन्होंने बताया कि एड्स के ईलाज के लिए सबसे अच्छा तरीका एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी या एआरटी है। इससे पूरा ईलाज तो नहीं होता, परंतु वायरल लोड बढ़ता नहीं है और व्यक्ति नॉर्मल लाइफ जी सकता है। एड्स की रोकथाम के लिए व्यापक जन जागरूकता विकसित करना बहुत ही आवश्यक है।
कुछ प्रमुख उपाय निम्नानुसार हैं:-
1. व्यक्ति को नियमित रूप से एचआईवी की जांच करानी चाहिए।
2. असुरक्षित यौन संबंधों से बचना चाहिए।
3.संक्रमित गर्भवती माता को इलाज करवाना चाहिए ताकि बच्चा संक्रमण से बच सके।
4. दूसरे के इंजेक्शन, सुई, केनुला आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
5. खून चढ़ाने से पहले इसकी अच्छी तरह जांच की जानी चाहिए.
6.विद्यार्थियों को बचपन से ही संयम, सदाचार,अनुशासन,चरित्र निर्माण की शिक्षा सख़्ताई से दी जानी चाहिए। अच्छे संस्कार विकसित करने चाहिए.
8. हमारे वेद -शास्त्रों में उल्लेखित ब्रह्मचर्य आश्रम तथा गृहस्थ आश्रम के नियमों (मर्यादाओं) की पालन की जानी चाहिए । अच्छी संगति में रहें। अच्छा साहित्य पढ़ें।
9. पश्चिमी भोगवादी संस्कृति की बजाय आत्म- अनुशासन और संयम की भारतीय संस्कृति की पालना करनी चाहिए।
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